हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता,
कहि सुनहि बहु विध सब सन्ता।
सिता राम चरित अति पावन,
मधुर सरस अरु अति मन भावन।
पुनि - पुनि कितनेहु सुने सुनाये,
हिय कि प्यास बुझत न बुझाए।
राम सिया-राम, सिया-राम, सिया-राम जै जै राम।
Wednesday, December 2, 2009
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