Wednesday, December 2, 2009

बून्द अघा सहहि गिरि कैसे, खल के वचन संत सहे जैसे।
 राम सिया-राम, सिया-राम, सिया-राम जै जै राम।
तुलसी अपने राम को रीझ भजो कै खीज उलटो, सऊधो ऊगि है खेत परे जो बीज

उल्टा नाम जपा जग जाना, बालमीकि भये ब्रम्ह समाना।
राम सिया-राम, सिया-राम, सिया-राम जै जै राम।

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